प्राचीनकाल में जीमूतवाहन नामक  एकटा राजा छलाह। ओ बहुत धर्मात्मा, परोपकारी, दयालु, न्यायप्रिय आ प्रजा के पुत्रक भाँति प्रेम करैत छलाह। एक बेर शिकार करबाक लेल मलयगिरि पर्वत पर गेलाह। ओहिठाम हुनकर भेंट मलयगिरि के राजकुमारी मलयवती सs भ गेलनि ,जे कि ओतय  पूजा करय सखी बहिनपाक संग आयल छलीह।  दूनु एक दोसर  के पसीन कs लेलनि। ओहि ठाम मलयवती केँ भाई सेहो आयल छलाह। मलयवती केर पिता बहुत दिन सs जीमूतवाहनक संग अपन बेटीक विवाह करेबाक  चिन्ता में छलाह। अतः जखन मलयवती केँ भाई केँ पता चललनि कि जीमूतवाहन आर मलयवती एक दोसर केँ चाहैत छथि त ओ बहुत खुश भेलाह, आओर अपन पिता केँ ई शुभ समाचार देबाक लेल चलि गेलाह।

एमहर मलयगिरिक चोटी पर घुमैत  राजा जीमूतवाहन  दूर सs कोनो स्त्रीक कानब सुनलनि। हुनक दयालु हृदय विह्वल भs उठल। ओ ओहि स्त्रीक समीप पहुँचलाह। आ सअनुरोध पुछला पर पता चललनि कि पूर्व प्रतिज्ञाक अनुसार हुनकर एकमात्र पुत्र शंखचूर्ण के आई गरुड़ केँ आहार केँ लेल  जेबाक छैन। नागक संग गरुड़ केँ जे समझौता भेल छल तकरा अनुसारे मलयगिरिक शिखर पर नित्य एकटा नाग ओकर आहारक लेल पहुँच जैत छल। शंखचूर्ण केँ मायक ई विपत्ति सुनि जीमूतवाहनक हृदय सहानुभूति आ करुणा सs भैर गेलनि, कियाक त शंखचूर्ण अपन मायक वृद्धावस्थाक एक मात्र सहारा छल।

जीमूतवाहन शंखचूर्ण केँ माय केँ आश्वासन देलनि कि- माता अपने चिंता जुनि करी हम स्वयं अपनेक पुत्रक स्थान पर गरुड़क आहार बनबाक लेल तैयार छी।

जीमूतवाहन ई कहि शंखचूर्ण केँ हाथ सs ओहि अवसर केँ लेल निर्दिष्ट लाल वस्त्र ल’ धारण केलनि आ हुनकर माता केँ प्रणाम कए विदाई केँ आज्ञा माँगलनि। नाग माता आश्चर्य में डूबि गेलीह। हुनकर हृदय करुणा सs आओर  बोझिल भs उठलनि आ ओ जीमूतवाहन केँ बहुत रोकबाक यत्न केलनि, मुदा ओ कहाँ रुकै वला छलाह। ओ तुरंत गरुड़ केँ  आहार के लेल नियत पर्वत शिखरक मार्ग पकड़लनि आओर माय आ पुत्र  आश्चर्य सs हुनका जाएत देखैत रहि गेला।

ओमहर समय पर गरुड़ जखन अपन भोजन-शिखर पर आयल आओर बड़ प्रसन्नता सs एमहर-ओमहर देखैत अपन भोजन पर मुँह लगेलक तँ ओकर प्रतिध्वनि सँ संपूर्ण शिखर गूँजयमान भs उठल। जीमूतवाहनक दृढ़ अंग पर पड़ल ओकर लोल केँ सेहो बड़का धक्का लगलै ।ई भीषण स्वर ओहि धक्के सs उत्पन्न भेल छल। गरुड़क माथ चकराय लागल। थोड़बा कालक पश्चात जखन गरुड़ के किछु सुधि एलै तखन ओ पूछलक- अपने केँ थिकौंह? हम अपनेक परिचय पएबाक लेल बेचैन भs रहल छी।

जीमूतवाहन अपन कपड़ा  में ओहि तरहें लेपटल रहलाह आ कहलनि , पक्षिराज हम राजा जीमूतवाहन छी, नागक माता केँ दुख हमरा सs देखल नञि गेल ताहि लेल हम ओकर स्थान पर  अपनेक भोजन बनबाक लेल आबि गेलौंह, अपने निःसंकोच हमरा खाऊ। पक्षिराज जीमूतवाहनक यश आ शौर्यक बारे में जानैत छलाह, ओ राजा केँ बड़ सत्कार सs उठोलनि आ हुनका सs अपन अपराधक  क्षमा-याचना करैत कोनो वरदान मांगबाक अनुरोध कएलनि।
गरुड़क बात सुनि प्रसन्नत्ता आओर कृतज्ञताक वाणी में राजा कहलैन जेँ हमर इच्छा अछि कि अपने आई तक जतेक नागक भक्षण कयलौंह अछि, ओहि सब केँ अपन संजीवनी विद्या केँ प्रभाव सs जीवित क दीं, जाहि सs शंखचूर्ण केर माता केँ समान आओर ककरो माता केँ दुःखक अवसर नञि भेटै।
राजा जीमुतवाहनक अहि परोपकारिणी वाणी में एतेक व्यथा भरल छल कि पक्षिराज गरुड़ विचलित भs उठलाह। ओ गदगद कंठ सs राजा केँ वचन पूरा करबाक वरदान देलैन आओर अपन अमोघ संजीवनी विद्या कर प्रभाव सs समस्त नाग केँ जीवित कय देलैन।
एही अवसर पर राजकुमारी मलयवती केँ पिता आ भाई सेहो जीमूतवाहनक खोजैत ओतहि पहुँच गेलैथ। बड़ धूमधाम सs मलयवतीक संग जीमूतवाहनक विवाह कैलैन।ई घटना आश्विन मासक अष्टमीक दिन  घटित भेल छल, वैह दिन सs समस्त स्त्री जाति में अहि पाबनिक महिमा व्याप्त भेल अछि।
जीमूतवाहनक एही प्रयास सs एकटा माय केँ पुत्रक रक्षा भेल, हुनकर पुत्र केर जीवनदान भेटलनि।
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